Wednesday, June 29, 2022

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।










ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। 
 पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ - वृहदारण्यक उपनिषद् 
 
पूर्ण सृष्टिको परिधिमा 
पूर्ण छन्, हर एक 
तिम्रो सत्तामा मेरो सार्थकता कति???
शायद शून्य 
मेसिनको रचना होइन 
एकै ढाँचामा ढल्न 
प्राकृत साँचोको सृजना 
अतुल्य दिव्यता 
अनन्त क्षमता 
असिम सम्भावना 
जरुरत थोरै प्रयासको 
पर्खाइको 

रोजाइ स्वयंको 
पतन या उत्थान 
नर या नारायण 
पशु या पशुपति 
असुर या सुर 

शायदै, मेरो आशिषको अर्थ रहला ? 
किनकी, तिमी मै समाउँछन् 
कृष्ण - क्राइस्ट 
बुद्ध - पैगम्बर 
नानक - महावीर 

भौतारिनुमा तुक नरहला 
तिमी मै छन् 
मन्दिर - मस्जिद
दरगाह - गुरुद्वार 
गुम्बा - गिर्जा 

पर्दा उघार 
तिम्रै वाणी बन्छ 
पुराण - कुरान 
आगम - त्रिपिटक 
गुरुग्रन्थ - बाइबल 

खोज, पाउने छौ, स्वयंमा 
कासी - कावा 
सारनाथ - अमृतसर 
जेरुसलेम - गिरनार 

बदल दृष्टि 
हरक्षण उत्सव 
होली - दिवाली 
प्रकाश - पूर्णिमा 
इष्टर - इद 

तिमी, पवित्रताको अपूर्व नमूना हौ 
सृष्टिको अनुपम रचना हौ 
भवसागरको बहना हौ 
"तत्त्वमसि" 
 
र, अन्तमा 
"अप्पो दिपो भव:" 
 बन्न सक्नु 
भन्न सक्नु 
"अनलहक" 
"अहम् ब्रह्मास्मि" 
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः 

इति

प्रभा अधिकारी 
सूर्यविनायक-५ 
भक्तपुर

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